في انتظار البرابرة - قسطنطين كافافي | اﻟﻘﺼﻴﺪﺓ.ﻛﻮﻡ

من أعلام الشعر اليوناني (1863-1933)


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لماذا نحن محتشدون في الساحة، ولأيِّ شيء منتظرون؟
إنهم البرابرة؛ سيكونون هنا هذا اليوم.
لماذا لم تحدثْ أيّ فعالية في مجلس الشيوخ؟
لماذا يجلس الشيوخ هناك ولا يَسنّونَ أيّ قانون؟

لأنّ البرابرة سيأتون هنا هذا اليوم.
أيَّ قانون سيشرِّع الشيوخ الآن؟
حالما يكون البرابرة هنا سيشرع الشيوخ القوانين.

لماذا استيقظ إمبراطورنا مبكراً
وهو جالس عند البوابة الرئيسة للمدينة
على عرشه ، رسميّـاً، وواضعٌ تاجَه على رأسه؟
لأن البرابرة سيأتون اليوم
والقيصر ينتظـر ليرحِّب برئيسهم.
فقد أعدّ قائمة طافحة
بأسماءٍ كثيرة وألقاب شتّى.

لماذا خرج القنصلان والقضاة اليوم
بملابسهم الحمر الفضفاضة الموشاة؟
لماذا لبسوا أساورَ مرصعةً بأحجار كريمة
وخواتم تشع ببريق الزُّمُـرُّد ؟
لماذا حملوا عِصِيّـهم الثمينةَ المرصّعةَ
بأشكالٍ من ذهب وفضة؟

لأنّ البرابرة سيأتون اليوم
ومثلُ هذه الأشياء تخلب ألبابَهم.

لماذا لا يأتي خطباؤنا المفوّهون كالعادة،
ليتكلمـوا، ولـيَـقولـوا ما يجب أن يقـولـوا؟
لأنّ البرابرة يأتون اليوم،
وهم يسأمون من خطب شعبيّـة بليغة.

لماذا أخذ كل واحد يشعر بالضجر؟
لمَ هو مضطرب؟ ( أنظر كيف أصبحت وجوههم
متجهّمة ) لماذا أقـفـرتِ الشوارعُ والسّاحاتُ منهم بهذه السّرعة،
وكلهم ذاهبون إلى بيوتهم بقلـق؟

لأنّ الليل أتى ، والبرابرة لم يصلوا ، ولأنّ
بعضَ الناس جاء من الحدود ،
وقال لا برابرة سيأتون بعد اليوم.

والآن، ما الذي سيحدث لنا من دون البرابرة؟
كانوا ، أولئكَ ، صيغـةَ حلٍّ .




(ﺟﻤﻴﻊ ﺗﺮﺟﻤﺎﺕ بهجت عباس)
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ما الذي ننتظر، في الساحة، مزدحمين ؟
البرابرة سيصلون اليوم .
ولم مجلس الشيوخ معطل ؟
الشيوخ لا يشترعون القوانين
فلم هم جالسون هناك إذن؟
لأن البرابرة يصلون اليوم .
أي قوانين سيشترعها الشيوخ الآن ؟
عندما يأتي البرابرة ، سيسنون هم القوانين .

لم يستيقظ امبرطورنا، مبكرا هكذا ؟
ولم يجلس الآن معتليا عرشه، معتمرا تاجه
عند البوابة الكبرى للمدينة ؟
لأن البرابرة يصلون اليوم .
و الإمبراطور ينتظر استقبال قائدهم.
و الحق أنه تهيأ ليوجه إليه خطبة
خلع عليه فيها كل الأسماء و الألقاب .

لم خرج قنصلانا معا، و القضاة
بأقبائهم الحمر، و أقبائهم المزركشة ؟
لم هذه الأساور، وكل هذا الحجر الكريم،
كل الخواتم ذات الزمرد المتألق ؟
لم يحملون اليوم صولجاناتهم الثمينة ؟
ذات المقابض الفضة، والنهايات الذهب ؟
لأن البرابرة سيصلون اليوم
وأشياء كهذه تدهش البرابرة .

لم لم يأت الخطباء، المفوهون، هنا، كالعادة
ملقين خطبهم، قائلين ما ينبغي أن يقولوا ؟
لأن البرابرة سيكونون اليوم، هنا
وهم يسأمون البلاغة و الفصاحة .
لم هذا الضيق المفاجئ، والإطراب ؟
لم غدت عابسة وجوه القوم ؟
لم تخلو الشوارع و الساحات، سريعا ؟
و الكل يعود إلى داره، غارقا في الفكر ؟
لأن الليل قد هبط ، ولم يأت البرابرة .
ولأن أناسا قدموا من الحدود
وقالوا أن ليس ثمة برابرة .

والآن … ماذا نفعل بدون برابرة ؟
لقد كان هؤلاء نوعا من حل.



(ﺟﻤﻴﻊ ﺗﺮﺟﻤﺎﺕ سعدي يوسف)
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- ماذا ننتظر، محتشدين هكذا في الساحة؟
- البرابرة سيصلون اليوم.
- ولِمَ مجلس الشيوخ في عطلة؟ ولمَ الشيوخ لا يسنّون القوانين؟
- لأن البرابرة سيصلون اليوم. وأي قوانين يسنّ الشيوخ؟
فحين يحضر البرابرة يقومون هم بذلك.
- لِمَ يستيقظ امبراطورنا مبكراً، ويجلس في أبهة تحت ظلة عند أبواب المدينة،
وعلى رأسه التاج؟
- لأن البرابرة سيصلون اليوم. والامبراطور يتأهب لاستقبال قائدهم؛
كذلك أعدّ خطبة يُنعم عليه فيها بالرتب والألقاب التشريفية.
- لمَ يزدانون بأساور من الجَمَشْت، وخواتم براقة من الزمرد؟
ولمَ يحملون صولجاناتهم النفيسة، والمرصّعة بدقة؟
- لأن البرابرة سيصلون اليوم، وهذه الأشياء الثمينة تُبهر البرابرة.
- لمَ خطباؤنا المفوّهون لم يأتوا لألقاء خطبهم البليغة كالعادة؟
- لأن البرابرة سيصلون اليوم،
وهم لا يقدرون لا العبارات الرنانة ولا الخطب الطويلة.
- ولمَ هذا القلق المفاجئ والاضطراب؟
يا للعجب، كيف غدت الوجوه عابسة!
ولمَ الشوارع والساحات تفرغ بسرعة زائدة؟
ولمَ يعود الجميع حزانى الى بيوتهم؟
- لأن الليل قد هبط، ولم يصل البرابرة.
والذين قدموا من الحدود يقولون أن لا أثر للبرابرة…

والآن، ماذا سنفعل بدون برابرة؟
كان هؤلاء على الأقل، حلاً من الحلول.




(ﺟﻤﻴﻊ ﺗﺮﺟﻤﺎﺕ هنري فريد صعب)
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Περιμένοντας τους Bαρβάρους


— Τι περιμένουμε στην αγορά συναθροισμένοι;

        Είναι οι βάρβαροι να φθάσουν σήμερα.

— Γιατί μέσα στην Σύγκλητο μια τέτοια απραξία;
  Τι κάθοντ’ οι Συγκλητικοί και δεν νομοθετούνε;

        Γιατί οι βάρβαροι θα φθάσουν σήμερα.
        Τι νόμους πια θα κάμουν οι Συγκλητικοί;
        Οι βάρβαροι σαν έλθουν θα νομοθετήσουν.


—Γιατί ο αυτοκράτωρ μας τόσο πρωί σηκώθη,
 και κάθεται στης πόλεως την πιο μεγάλη πύλη
 στον θρόνο επάνω, επίσημος, φορώντας την κορώνα;

        Γιατί οι βάρβαροι θα φθάσουν σήμερα.
        Κι ο αυτοκράτωρ περιμένει να δεχθεί
        τον αρχηγό τους. Μάλιστα ετοίμασε
        για να τον δώσει μια περγαμηνή. Εκεί
        τον έγραψε τίτλους πολλούς κι ονόματα.


— Γιατί οι δυο μας ύπατοι κ’ οι πραίτορες εβγήκαν
 σήμερα με τες κόκκινες, τες κεντημένες τόγες·
 γιατί βραχιόλια φόρεσαν με τόσους αμεθύστους,
 και δαχτυλίδια με λαμπρά, γυαλιστερά σμαράγδια·
 γιατί να πιάσουν σήμερα πολύτιμα μπαστούνια
 μ’ ασήμια και μαλάματα έκτακτα σκαλιγμένα;

        Γιατί οι βάρβαροι θα φθάσουν σήμερα·
        και τέτοια πράγματα θαμπώνουν τους βαρβάρους.


—Γιατί κ’ οι άξιοι ρήτορες δεν έρχονται σαν πάντα
 να βγάλουνε τους λόγους τους, να πούνε τα δικά τους;

        Γιατί οι βάρβαροι θα φθάσουν σήμερα·
        κι αυτοί βαρυούντ’ ευφράδειες και δημηγορίες.

— Γιατί ν’ αρχίσει μονομιάς αυτή η ανησυχία
 κ’ η σύγχυσις. (Τα πρόσωπα τι σοβαρά που εγίναν).
 Γιατί αδειάζουν γρήγορα οι δρόμοι κ’ η πλατέες,
 κι όλοι γυρνούν στα σπίτια τους πολύ συλλογισμένοι;

        Γιατί ενύχτωσε κ’ οι βάρβαροι δεν ήλθαν.
        Και μερικοί έφθασαν απ’ τα σύνορα,
        και είπανε πως βάρβαροι πια δεν υπάρχουν.

                               __

 Και τώρα τι θα γένουμε χωρίς βαρβάρους.
 Οι άνθρωποι αυτοί ήσαν μια κάποια λύσις. 


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